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भारत को अफगानिस्तान के 'तालिबानी चक्रव्यूह' में क्यों फंसा रहा है अमेरिका?
May 9, 2020 • Rajkumar Gupta

अफगानिस्तान में अपने हजारों सैनिकों की कुर्बानी देने और अरबों डॉलर स्वाहा करने के बाद अमेरिका कुछ खास हासिल नहीं कर पाया है। अब वह चाहता है कि भारत अफगानिस्तान की आंतरिक राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल हो।

सूत्रों के मुताबिक अमेरिका के विशेष दूत जेड खालिजाद और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बीच हाल में नई दिल्ली में इस बारे में बात हुई थी। इस बैठक में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश सचिव हर्ष शृंगला भी शामिल हुए।

अफगानिस्तान में बढ़ रही है अराजकता
सूत्रों का कहना है कि खालिजाद आनन-फानन में कुछ घंटों के लिए दिल्ली आए थे। वह बाद में भी आ सकते थे लेकिन उन्होंने इसी वक्त आना मुनासिब समझा। अफगानिस्तान में अलग-अलग गुटों के बीच चल रही शांति वार्ता की डोर कभी भी टूट सकती है। कोरोना काल में अफगान सरकार के बीच भी राजनीतिक गतिरोध है और तालिबान की ओर से हिंसा में तेजी आई है। इन घटनाओं से देश में अराजकता बढ़ गई है।

तालिबान को वैधता नहीं देना चाहता भारत
सूत्रों के मुताबिक अमेरिका मानता है कि अफगानिस्तान की शांति और विकास में भारत की अहम भूमिका है। एक सूत्र ने कहा, 'अगर हमें इस प्रक्रिया में कारगर भूमिका निभानी है तो हमें इस प्रक्रिया का हिस्सा बनना पड़ेगा।' यह पहला मौका है जब भारत ने स्वीकार किया है कि उसे अफगानिस्तान में व्यापक शांति प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहिए। भारत अब तक इससे परहेज करता आया है। इसकी वजह यह है कि इसमें तालिबान और पाकिस्तान भी शामिल हैं। भारत अच्छी तरह जानता है कि तालिबान अब भी पाकिस्तान के इशारों पर नाचता है। भारत एक आतंकवादी संगठन को वैधता नहीं देना चाहता है।

अशरफ गनी सरकार पर भारत का प्रभाव
भारत ने तालिबान के साथ संपर्क साधने के बजाय अफगानिस्तान की चुनी हुई सरकार का समर्थन किया है। यही वजह है कि आज अशरफ गनी सरकार पर भारत का प्रभाव किसी भी अन्य देश से ज्यादा है। इस मामले में केवल अमेरिका ही उसे टक्कर दे सकता है।

अफगानिस्तान में हाल के दिनों में हिंदुओं और सिखों पर हमले ने भारत का ध्यान खींचा है। खासकर काबुल गुरुद्वारे पर हुए हमले ने भारत को झकझोर कर रख दिया है। यह हमला लश्करे तैयबा और हक्कानी नेटवर्क ने किया था। इसमें इस्लामिक स्टेट इन इराक ऐंड लेवेंट खोरसान प्रॉविन्स (ISKP) की भी मिलीभगत थी। इसने पाकिस्तान के इस दावे की भी धज्जियां उड़ा दी कि आईएसकेपी और तालिबान एकदूसरे के खिलाफ हैं।