ALL Rajasthan
भारत LAC पर तेजी से मजबूत कर रहा है बॉर्डर और मिलिटरी इन्फ्रास्ट्रक्चर, इसी से चिढ़ा चीन कर रहा चालबाजी
May 27, 2020 • Rajkumar Gupta


नई दिल्ली
चीन अब तक सीमाई इलाकों में तेजी से इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास और विस्तार करता आया है। दूसरी तरफ भारत भी अब बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जोर दे रहा है और सड़क व एयरबेस जैसी कई रणनीतिक परियोजनाओं पर काम कर रहा है। फॉरवर्ड एरिया में सैनिकों और युद्धसामग्री की तेजी से मूवमेंट सुनिश्चित करने के लिए पिछले कुछ सालों से भारत ने बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर धीरे-धीरे लेकिन लगातार सुधार किया है। यही बात पेइचिंग को रास नहीं आ रही। मौजूदा गतिरोध (India-China standoff) और तनाव की असली वजह भी यही है।

रोड, एयर कनेक्टिविटी में चीन के दबदबे को चुनौती दे रहा भारत
वैसे भारत अभी भी बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर के मामले में चीन के मुकाबले बहुत पीछे है। लेकिन वह लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक 3,488 किलोमीटर लंबे लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) के ऊंचाई वाले विवादित क्षेत्रों में रोड और एयर कनेक्टिविटी के मामले में चीन के दबदबे को लगातार चुनौती दे रहा है।

पिछले साल 255 किमी लंबा DSDBO रोड हुआ पूरा
इससे चीन निश्चित तौर पर चिढ़ा हुआ है। पूर्वी लद्दाख में चीन के तनाव बढ़ाने वाली हरकतों के पीछे भारत का बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर के मामले में आक्रामक होना है। उदाहरण के तौर पर नई दिल्ली ने पिछले साल 255 किलोमीटर लंबे दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी (DBO) यानी DSDBO रोड को पूरा किया। इसके अलावा कुछ अतिरिक्त लिंड रोड और पुलों को बनाने का काम चल रहा है।

DSDBO पर बने हैं 37 पुल, सैनिकों और लॉजिस्टिक्स के लिए कई लिंक
DSDBO रोड पर 37 पुलों का निर्माण हुआ है। यह तकरीबन एलएसी के समानांतर है जो देपसैंग और गलवान घाटी इलाके में आसान पहुंच उपलब्ध कराता है। यह सड़क रणनीतिक रूप से बेहद अहम काराकोरम दर्रे के नजदीक खत्म होती है। ये सड़क कई जगहों पर सैनिकों और साजोसामान के मूवमेंट के लिए कई गहराई वाले इलाकों में कई जगह लिंक की गई है।

बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर से सैनिकों के आमने-सामने आने की घटनाएं भी बढ़ेंगी
एक सीनियर ऑफिसर ने बताया, 'हमारी कुछ सड़कें अब लद्दाख के सीमाई इलाकों में सैनिकों की तेजी से मूवमेंट की सुविधा दे रही हैं। इससे पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) अपसेट है। दोनों ओर से बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर का मतलब है कि दोनों पक्ष के सैनिकों के आमने-सामने आने की घटनाएं बढ़ेंगी।'

भारत ने बढ़ाया बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर, लेकिन अभी पर्याप्त नहीं
एलएसी पर भारत बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर बढ़ाया तो है लेकिन अभी भी यह पर्याप्त नहीं है। अधिकारी ने बताया, 'उदाहरण के तौर पर पूर्वी अरुणाचल प्रदेश में हमारी मुख्य सड़कें एलएसी से 20 से 70 किलोमीटर की दूरी पर हैं। हमारे सैनिकों को फॉरवर्ड इलाकों में पट्रोलिंग के लिए मीलों तक पैदल चलना पड़ता है। दूसरी तरफ पीएलए को इस तरह की किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ता है।'

2012 तक बन जानी थी 73 सड़कें, सिर्फ 35 पूरी हुईं
हर मौसम में चलने लायक रणनीतिक तौर पर अहम 73 सड़कों में से सिर्फ 35 ही पूरी हो पाई हैं। इनको बनाने की योजना करीब 2 दशक पहले ही बना ली गई थी। कुल 4,643 किलोमीटर लंबाई की इन 73 सड़कों को बनाने के लिए सबसे पहले 1999 में मंजूरी दी गई थी। 2006 में फैसला हुआ कि 2012 तक इन सभी 73 सड़कों के निर्माण को पूरा कर लिया जाएगा। 35 सड़कों का निर्माण पूरा होने के बाद 11 अन्य रणनीतिक सड़कों को इसी साल पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। जबकि दिसंबर 2022 तक बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन के जिम्मे आईं सभी 61 सड़कों को पूरा करने का लक्ष्य है।

फॉरवर्ड एयरबेसों को मजबूत करने की दिशा में अच्छी प्रगति
भारत ने सीमाई इलाकों में एयर फोर्स के लिए जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चरों को और मजबूत करने की दिशा में अच्छी प्रगति की है। पूर्वी लद्दाख के न्योमा, डीबीओ और फकचे के साथ-साथ अरुणाचल प्रदेश के पासीघाट, मेचुका, वैलोंग, तुतिंग, अलोंग और जिरो में पुराने अडवांस लैंडिंग ग्राउंड्स (ALGs) को न सिर्फ री-ऐक्टिवेट कर दिया गया है बल्कि उन्हें अपग्रेड भी किया गया है। अब यहां सी-17 ग्लोबमास्टर-3 और सी-130 जे सुपर हरक्युलिस एयरक्राफ्ट भी लैंड करने लगे हैं। इससे जरूरत पड़ने पर भारत अब एलएसी पर तेजी से सैनिकों और सैन्य उपकरणों को मूव कर सकता है। उदाहरण के तौर पर दौलत बेग ओल्डी में भारत ने 16,614 फीट की ऊंचाई पर ALG बनाया है जो दुनिया में सबसे ज्यादा ऊंचाई पर बनी हवाई पट्टी है।

तिब्बत में ही चीन के 14 एयरबेस, एयरक्राफ्ट की पार्किंग के लिए बना रहा सुरंगें
बात अगर चीन की करें तो उसने बॉर्डर पर मिलिटरी इन्फ्रास्ट्रक्चर का एक जाल तैयार कर चुका है। उदारण के तौर पर तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में 14 एयरबेस बना चुका है। विशाल रेल नेटवर्क और 58,000 किलोमीटर लंबी सड़कों के जाल को तैयार कर चुका है। चीन अब अपने फाइटरजेट्स की पार्किंग के लिए कुछ एयरबेसों के पास पहाड़ खोदकर सुरंग बना रहा है।