ALL Rajasthan
जैविक हथियारों से कम खर्च में बड़े पैमाने पर तबाही मचा सकते हैं आतंकी
April 12, 2020 • Rajkumar Gupta


नई दिल्ली,किया है। जैविक हथियार न सिर्फ बड़े पैमाने पर तबाही मचाने की क्षमता रखते हैं, बल्कि उनकी पहचान काफी मुश्किल और निर्माण बेहद किफायती होता है। आइए जानें, जैविक हमला क्या होता है और इतिहास में कब-कैसे जैविक हथियारों का इस्तेमाल किया गया है-

क्या होता है जैविक हमला
-जैविक हमले में मनुष्यों और पशु-पक्षियों को मारने अथवा निशक्त बनाने या फिर फसलों को तबाह करने के लिए उन पर संक्रामक तत्वों (मसलन, घातक जीवाणु, विषाणु, कीटाणु व फफूंद) या जैविक आविष (पेड़-पौधों, जीवों में पैदा होने वाले जहरीले पदार्थों) से लैस बायोवेपन (जैविक हथियार) से वार किया जाता है। सैन्य संघर्ष में बायोवेपन का प्रयोग युद्ध अपराध माना जाता है।

जनसंहारक हथियारों का दर्जा
-जैविक हथियारों के निर्माण में उन सजीव तत्वों का इस्तेमाल किया जाता है, जो विभिन्न सतहों पर कई दिनों तक जीवित रहने और अपनी संख्या में तेजी से इजाफा करने में सक्षम हैं। परमाणु और रासायनिक हथियारों की तरह ही बायोवेपन को भी जनसंहारक हथियारों की श्रेणी में रखा गया है। इनसे हमलावर किसी एक व्यक्ति से लेकर सीमित लोगों के समूह या पूरी की पूरी आबादी को निशाना बना सकता है।

खतरनाक क्यों
-चेचक और न्यूमोनिक प्लेग के लिए जिम्मेदार विषाणु एयरोसोल (सांस लेने और बोलने के दौरान नाक-मुंह से निकलने वाली पानी की सूक्ष्म बूंदें) के जरिये एक व्यक्ति से दूसरे में फैल सकते हैं
-चूंकि जैविक हमले का असर उभरने में समय लगता है, इसलिए इसे भांपना आसान नहीं होता, यही नहीं, ऐसे हमले में संक्रमण का प्रसार उन लोगों में भी हो सकता है, जो निशाने पर होते ही नहीं हैं
-इसके अलावा, लैब में रिसर्च के दौरान मामूली चूक से शोधकर्ता खुद वायरस की जद में आ सकता है (जैसा इबोला के मामले में हुआ), उससे बाहरी लोगों में भी संक्रमण फैलाने का खतरा रहता है

तीन तरह से होता वार
1.हमलावर खाने-पीने की चीजों, फसलों और जलस्रोतों में जैविक आविष मिला सकता है
2.हथियार प्रणाली (पाउडर बम, कीट बम, स्प्रे आदि) में संक्रामक तत्वों, जहरीले पदार्थों को कैद करना संभव
3.वायरस से लैस व्यक्ति या कपड़े-पत्र भेजकर भी बड़ी आबादी को संक्रमित करना मुमकिन

इस्तेमाल का इतिहास
-12वीं शताब्दी के हत्ती साहित्य में जैविक हमले का पहला ज्ञात जिक्र, तुलारेमिया (संक्रामक बुखार, त्वचा इंफेक्शन) के शिकार मरीजों को दुश्मन के इलाकों में भेजा गया था, जिससे वहां महामारी फैल गई
-कुछ इतिहासकारों ने ट्रॉय के युद्ध में जैविक आविष से लैस तीरों के इस्तेमाल का जिक्र किया है, यूनान में हुए पहले धर्म युद्ध में प्राचीन किरहा प्रांत के जलस्रोतों में विशाक्त पौधे के अंश मिलाने का है दावा
-बताया जाता है कि 1346 में काफा (अब थियोडोशिया) पर कब्जे की लड़ाई में मंगोल शासकों ने प्लेग से मरने वाले अपने जवानों को जैविक हथियार के तौर पर आजमाया, इससे दुश्मन सेना में महामारी फैल गई
-यह भी कहा जाता है कि 1710 में स्वीडन से युद्ध में रूसी सेनाओं ने रेवल (अब तालिन) में प्लेग से मरने वाले लोगों के शव छोड़ दिए थे, 1785 में ला काले पर कब्जे के लिए ट्यूनीशियाई फौजों ने संक्रमित कपड़ों का सहारा लिया था

विश्व युद्ध और उसके बाद
-प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) के दौरान दुश्मन देशों में फसलें तबाह करने और मवेशियों को संक्रमित कर महामारी फैलाने के लिए जर्मनी ने एंथ्रेक्स व ग्लैंडर्स का सहारा लिया
-इतिहास में जिक्र है कि 1940 के दशक में ब्रिटेन और अमेरिका ने तुलारेमिया, एंथ्रेक्स, ब्रूसेलोसिस व बॉट्युलिज्म की मदद से बड़े पैमाने पर जैविक हथियार तैयार किए थे
-1930 और 1940 के दशक में चीन-जापान युद्ध के दौरान जापानी वायुसेना ने चीन के निंग्बो शहर पर भारी संख्या में प्लेग से संक्रमित कीटों से भरे सेरेमिक बम गिराए थे
-सितंबर-अक्तूबर 2001 में अमेरिकी संसद और मीडिया के सदस्यों को एंथ्रेक्स के विषाणु से संक्रमित पत्र भेजे गए, हमले में 22 लोग बीमार पड़े, इनमें से पांच की मौत भी हो गई

जैव-आतंकवाद का खतरा
-जैविक हथियारों की पहचान मुश्किल, इस्तेमाल आसान और उत्पादन बेहद किफायती
-व्यापक स्तर पर असर उभरने में समय लगता, ऐसे में जांच एजेंसियों से बचना आसान
-बड़े क्षेत्रफल में भीषण तबाही मचाने की क्षमता, इसलिए आतंकी इस्तेमाल का जोखिम ज्यादा

सस्ता और घातक
-0.05% ही लागत आती पारंपरिक विध्वंसक हथियारों के मुकाबले बायोवेपन बनाने में
-3 से 7 दिन तक जीवित रह सकते हैं संक्रामक तत्व अलग-अलग सतहों और व्यक्ति में

170 देशों ने प्रतिबंध को दी मान्यता
-1972 में जैविक हथियार संधि (बीडब्ल्यूसी) के जरिये बायोवेपन के उत्पादन, एकत्रिकरण और इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया गया था, ताकि बड़े पैमाने पर लोगों की जान लेने के साथ ही आर्थिक-सामाजिक गतिविधियों को पूरी तरह से ठप करने की कूव्वत रखने वाले जैविक हमलों को रोका जा सके। अप्रैल 2013 तक दुनिया के 170 देश बीडब्ल्यूसी को मान्यता दे चुके हैं।