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कोरोना ने तोड़ दी है इकॉनमी की कमर, बिगड़ जाएगा बजट 2020 का पूरा गणित?
April 6, 2020 • Rajkumar Gupta

नई दिल्ली
करीब दो महीने पहले जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारण ने वित्त वर्ष 2020-21 के लिए बजट पेश किया था तब उन्होंने नहीं सोचा होगा कि दो महीने के भीतर ऐसी स्थिति पैदा हो जाएगी जिससे बजट का गणित पूरी तरह बिगड़ जाएगा और सरकार को नए सिरे से अपने खर्च और प्रॉयरिटी डिसाइड करने की जरूरत होगी। बजट में सरकार ने जो भी लक्ष्य तय किए थे अब साइडलाइन हो चुके हैं। फिलहाल सरकार का फोकस देश की इकॉनमी को कोरोना की चपेट से बचाना है।

1.7 लाख करोड़ के पैकेज का ऐलान, दूसरे की तैयारी
सबसे पहले जानते हैं कि कोरोना के कारण इकॉनमी पर तात्कालिक क्या प्रभाव दिख रहे हैं और सरकार की तरफ से बचाव के क्या उपाए किए गए हैं। हाल ही में निर्मला सीतारमण ने 1.7 लाख करोड़ के कोरोना स्पेशल पैकेज का ऐलान किया है। 21 दिनों के लॉकडाउन से निपटने के लिए सरकार अभी से दूसरे बूस्टर पैकेज के बारे में विचार कर रही है।

52 फीसदी तक नौकरियां कम हो सकती हैं
कोरोना के कारण जारी लॉकडाउन से बेरोजगारी की समस्या विकराल होने जा रही है। सीआईआई ने कहा, 'घरेलू कंपनियों की आय और लाभ दोनों में इस तेज गिरावट का असर देश की आर्थिक वृद्धि दर पर भी पड़ेगा। रोजगार के स्तर पर इनसे संबंधित क्षेत्रों में 52 प्रतिशत तक नौकरियां कम हो सकती हैं।' सर्वेक्षण के अनुसार, लॉकडाउन खत्म होने के बाद 47 प्रतिशत कंपनियों में 15 प्रतिशत से कम नौकरियां जाने की संभावना है। वहीं 32 प्रतिशत कंपनियों में नौकरियां जाने की दर 15 से 30 प्रतिशत होगी।

कंपनी की इनकम 10% से अधिक घटेगी
सर्वेक्षण के अनुसार, 'चालू तिमाही (अप्रैल-जून) और पिछली तिमाही (जनवरी-मार्च) के दौरान अधिकांश कंपनियों की आय में 10 प्रतिशत से अधिक कमी आने की आशंका है और इससे उनका लाभ दोनों तिमाहियों में पांच प्रतिशत से अधिक गिर सकता है।'

विकास दर 30 सालों के न्यूनतम स्तर पर
तमाम रेटिंग एजेंसियों ने देश की विकास दर को घटाकर 2-3 फीसदी के बीच में कर दिया है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने भारत के वृद्धि अनुमानों को घटाकर दो प्रतिशत कर दिया है। यह 30 साल का न्यूनतम स्तर होगा। पहले उसने अनुमान घटाकर 5.1 प्रतिशत किया था। यह स्थिति भयानक इसलिए है क्योंकि कोरोना के मामले में तेजी आ गई है। ऐसे में पूरी संभावना है कि लॉकडाउन को मजबूरी में आगे बढ़ाना पड़े।

लॉकडाउन से सैकड़ों अरब का नुकसान
21 दिनों के लॉकडाउन से इकॉनमी को कम से कम 100 अरब डॉलर का नुकसान होने की संभावना है। इस फेज में कोरोना के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं तो इसकी संभावना है कि लॉकडाउन को और आगे बढ़ाया जाए। इससे स्थिति और बिगड़ जाएगी।

लगातार घट रही है सरकार की कमाई
एक तरफ सरकार राहत पैकेज की घोषणा कर रही है दूसरी तरफ उसकी कमाई लगातार घट रही है। जनवरी 2020 में जीएसटी कलेक्शन करीब 1.10 लाख करोड़ था जो फरवरी में घटकर 1.05 लाख करोड़ हो गया। मार्च में जीएसटी कलेक्शन गिरकर 97597 करोड़ रह गया। वर्तमान आर्थिक हालात के कारण अप्रैल में इसमें और गिरावट की पूरी संभावना है।

राजकोषीय घाटे का लक्ष्य अब हवा हुई
पिछले दो बजट से सरकार का फोकस राजकोषीय घाटा कम करने पर था। 2019-20 के लिए यह 3.8 फीसदी था हालांकि लक्ष्य 3.3 फीसदी रखा गया था। वित्त वर्ष 2020-21 के लिए यह लक्ष्य 3.5 फीसदी रखा गया है। सरकार इस लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए चालू वित्त वर्ष में विनिवेश से कमाई का लक्ष्य 2 लाख करोड़ रुपये रखा था। इसी के तहत घोषणा की गई थी कि LIC का आईपीओ जारी किया जाएगा। जानकारों का कहना था कि इससे सरकार करीब 50 हजार करोड़ का फंड इकट्ठा कर लेगी।

जीडीपी का आधा है सरकार पर कर्ज
फिस्कल डेफिसिट पर अगर गौर करेंगे तो यह तेजी से बढ़ रहा है। 2019-20 में सरकार पर कुल कर्ज करीब 7.1 लाख करोड़ था। 2020-21 के लिए यह लक्ष्य 7.8 लाख करोड़ रखा गया। यह जीडीपी का करीब 50 फीसदी है। कोरोना का असर जितना व्यापक होगा कर्ज बढ़ता जाएगा और फिस्कल डेफिसिट का फासला भी।

एजीआर भुगतान से आए थे 27000 करोड़
इसके अलावा भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल), भारतीय जहाजरानी निगम और कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया समेत पांच प्रमुख सार्वजनिक उपक्रमों में सरकार की हिस्सेदारी बेचने को भी मंजूरी दी गई। एजीआर बकाए को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सरकार का खजाना भरा था। एयरटेल ने करीब 18000 करोड़ रुपये जमा किए और वोडाफोन ने करीब 7000 करोड़ रुपये जमा किए। टाटा टेलिसर्विस ने करीब 2200 करोड़ रुपये चुकाए थे। इस तरह सरकार को कुल 27000 करोड़ रुपये आए थे। लेकिन कोरोना ने इस खुशी पर पानी फेर दिया है।

फिर से तय करनी होगी प्राथमिकताएं
कुल मिलाकर वर्तमान आर्थिक परिस्थिति में सरकार ने बजट में जो कुछ ऐलान किए थे वह अब किसी काम के नहीं लग रहे हैं। कोरोना का असर कम होने के बाद सरकार को एकबार फिर से अपनी प्राथमिकता तय करनी होगी और कमाई को ध्यान में रखते हुए खर्च को भी डिसाइड करना होगा।