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कोरोना से कैसे लड़ता है शरीर, यूं ठीक होता है मरीज
April 17, 2020 • Rajkumar Gupta


बहुत से लोगों के मन में एक सवाल ये उठता है कि आखिर कोरोना वायरस शरीर पर हमला कैसे करता है और क्या करता है। लोग ये भी सोचते हैं कि मरीज ठीक कैसे होते हैं और आखिर हमारा शरीर कोरोना से कैसे लड़ता है।

कोरोना से कैसे लड़ता है शरीर, यूं ठीक होता है मरीजनई दिल्ली
कोरोना वायरस पूरी दुनिया में तेजी से फैल रहा है, जिस पर लगाम लगाने के लिए हर देश की सरकार सख्त से सख्त फैसले ले रही है। भारत में भी कोरोना वायरस की वजह से ही 24 मार्च से 14 अप्रैल तक लॉकडाउन का पहला चरण चला और अब 3 मई तक के लिए दूसरा चरण चलाया जा रहा है। पूरे देश में अब तक कोरोना वायरस की वजह से 12759 से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं, जबकि 420 लोगों की मौत हो चुकी है। दुनिया भर में कोरोना से संक्रमण का आंकड़ा 21.51 लाख से भी अधिक है, जबकि मरने वाले लोगों की संख्या 1.43 लाख से भी अधिक हो गई है।
दुनिया भर में करीब 5.26 लाख से भी अधिक लोग सही होकर घर जा चुके हैं, वहीं भारत में भी 1500 से भी अधिक लोग अब तक कोरोना को मात देने में कामयाब हुए हैं। ऐसे में लोगों के मन में एक सवाल ये उठता है कि ये वायरस शरीर पर हमला कैसे करता है और क्या करता है। साथ ही लोग ये भी सोचते हैं कि आखिर हमारा शरीर कोरोना से कैसे लड़ता है। आइए जानते हैं ये सारी बातें।
शरीर पर कैसे हमला करता है कोरोना वायरस?

- कोरोना वायरस नाक, मुंह या आंख के जरिए शरीर में घुसता है और सांस की नली या फेफड़ों के अंदर जाकर वहां रहने लगता है।
-वायरस धीरे-धीरे कोशिकाओं को हाईजैक करना शुरू कर देता है और तब तक अपने जैसे वायरस बनाता रहता है, जब तक कि कोशिका मर ना जाए। इसके बाद वह एक इंसान से दूसरे इंसानों में भी फैलने की क्षमता हासिल कर लेता है।
-जब वायरस बहुत सी कोशिकाओं को खत्म करने में कामयाब हो जाता है तो इससे लड़ने के लिए हमारा इम्यून सिस्टम का करना शुरू कर देता है, जिससे थोड़े जलन का आभास होता है। इसकी वजह से फेफड़ों के अंदर की नलियों (Alveoli) में एक तरल जमा होने लगता है, जिसकी वजह से सूखा कफ और सांस लेने में तकलीफ होती है।
-गंभीर मामलों में फेफड़ों में जलन की वजह से cytokine storm की स्थिति पैदा हो जाती है, जो SARS और MERS के मरीजों में एक सामान्य लक्षण था।
- जब बहुत सारी Alveoli यानी फेफड़ों के अंदर की नलियां इस वायरस की वजह से तबाह हो जाती हैं तो मरीज को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ती है। गंभीर स्थिति हो जाने पर शरीर के कई अंग फेल होने लगते हैं और मरीजों की मौत हो जाती है।

सामान्य केस में क्या होता है?
एक मरीज को पूरी तरह ठीक होने में करीब 6 हफ्ते तक लग जाते हैं और अधिकतर मरीजों में कोरोना वायरस के मामूली लक्षण दिखते हैं। सिर्फ 15 से 20 फीसदी मामले ही गंभीर होते हैं। मामूली केस में सामान्य कफ, बुखार, सीने में दर्द और मांसपेशियों में दर्द की शिकायत होती है। ऐसे मरीज करीब दो हफ्तों में ठीक हो जाते हैं। ऐसे लोग सेल्फ आइसोलेशन कर सकते हैं और ठीक हो जाते हैं। कुछ ऐसे भी मरीज होते हैं तो संक्रमित होकर ठीक भी हो जाते हैं और उनमें कोई लक्षण भी नहीं दिखता।
मॉडरेट मामलों में भर्ती होने की जरूरत
कोरोना वायरस के मॉडरेट यानी सामान्य से अधिक, लेकिन गंभीर से कम मामलों में भर्ती होने की जरूरत होती है। ऐसे में मरीजों को सांस लेने में काफी तकलीफ होती है। कुछ मरीजों में तेज बुखार और डीहाइड्रेशन हो जाता है। ऐसे मरीजों को आईवी फ्लूड देने की जरूरत होती है।
जानलेवा होते हैं गंभीर मामले
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यूं तो 15-20 फीसदी कोरोना वायरस के संक्रमण के मामले ही गंभीर होते हैं, लेकिन गंभीर मामले जानलेवा साबित हो सकते हैं। ऐसे मरीजों के फेफड़ों में बहुत अधिक तरल भर जाने की वजह से सांस लेना मुश्किल हो जाता है और वेंटिलेटर की जरूरत होती है। कुछ हफ्तों तक वेंटिलेटर पर रखना जरूरी होता है। बुजुर्ग और पहले से ही किसी बीमारी या दिल के रोग वाले मरीज मुश्किल से ही इससे ठीक हो पाते हैं। ऐसे में मामलों में 30-40 फीसदी लोगों की मौत हो जाती है। ऐसे मरीजों को वेंटिलेटर से हटाने से पहले ये सुनिश्चित करना होता है कि वह कुछ निगलने की हालत में हों। साथ ही उसे कम ऑक्सीजन की जरूरत हो और वह कॉर्बन डाई ऑक्साइड को साफ करने की स्थिति में हो।
कब डिस्चार्ज होता है कोई मरीज?
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वैसे तो किसी भी मरीज को सिर्फ तभी डिस्चार्ज किया जाता है, जब उसकी रिपोर्ट लगातार दो बार निगेटिव आ जाती है। हालांकि, अलग-अलग देशों में कुछ और भी जरूरी नियम-कायदे हो सकते हैं। चीन में अगर कोई मरीज 3-4 दिन तक बुखार से पीड़ित नहीं होता और उसके फेफड़ों में जलन नहीं होती तो उसे ठीक हो गया मानते हैं। वहीं अमेरिका में मामूली लक्षण में भी कम से कम 1 सप्ताह तक मरीज को देखा जाता है। वहीं भारत जैसे देश में सही होकर डिस्चार्ज होने के बाद भी कम से कम 14 दिनों के लिए सेल्फ क्वारेंटाइन में रहना जरूरी होता है।