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लापरवाहीः केरल की तुलना में महाराष्ट्र में 16 गुना ज्यादा कोरोना केस, लॉकडाउन के समय समान थे आंकड़े
April 13, 2020 • Rajkumar Gupta

मुंबई
कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों के बीच जब देश में लॉकडाउन का ऐलान हुआ था, तब महाराष्ट्र और केरल दोनों राज्यों में कोरोना वायरस के एक ही संख्या में मामले सामने आए थे। आज स्थिति यह है कि महाराष्ट्र में केरल से 16 गुने ज्यादा कोरोना पॉजिटिव केस हैं। महाराष्ट्र में कोरोना पॉजिटिव मरीजों का आंकड़ा 1982 हो गया है, जबकि केरल में यह आंकड़ा महज 374 का है। महाराष्ट्र में 149 लोगों की मौत हो चुकी है, वहीं केरल में दो लोगों की मौत हुई है।
26 मार्च को देश में लॉकडाउन हुआ था। तब महाराष्ट्र में 122 और केरल में 120 कोरोना के मामले थे। मध्य पूर्व से आने वाले लोगों के साथ-साथ कुछ जिलों में मामलों की सघनता में भी दोनों राज्यों में समानता थी। खास बात यह है कि दोनों ही राज्यों में कई जांच हुई हैं। हालांकि प्रति मिलियन जनसंख्या केरल की ज्यादा है, फिर भी, लॉकडाउन के 18 दिन बाद, महाराष्ट्र में मामलों की संख्या 16 गुना बढ़कर 1,982 हो गई है। केरल में जो 374 मामले आए हैं, उनमें से लगभग आधे लोग ठीक भी हो चुके हैं।

देश में सबसे ज्यादा मृत्यु दर मुंबई में
मुंबई, राज्य को कोरोना केंद्र बन गया है। मुंबई (Mumbai) में पॉजिटिव मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, इतना ही नहीं देश में सबसे ज्यादा मृत्युदर भी इसी शहर की है। सार्वजनिक स्वास्थ्य फाउंडेशन ऑफ इंडिया के महामारी विशेषज्ञ डॉ. गिरिधर आर बाबू ने कहा कि यह संभव है कि गंभीर बीमारी के मामले में देर से और बहुत प्रभावी उपचार न किया गया हो।

महाराष्ट्र ने 36771 सैंपल लिए हैं, जिनमें से 34094 कोरोनो वायरस निगेटिव थे। 11 अप्रैल तक महाराष्ट्र ने प्रति मिलियन 298 जांच किए। दूसरी ओर केरल ने 14163 सैंपलों की जांच की, जिनमें से 12818 निगेटिव थे। केरल ने प्रति मिलियन 401 परीक्षण किए हैं, जो महाराष्ट्र की तुलना में ज्यादा है।

अधिकारियों की लापरवाही ने बढ़ाए मामले!
बहरहाल, राष्ट्रीय औसत की तुलना में महाराष्ट्र में भले ही ज्यादा जांचें हुई हों लेकिन यहां अधिक मौतें भी हुई हैं। इससे साफ है कि राज्य में ठीक से मॉनिटरिंग नहीं की गई। 1 रुपये क्लिनिक के संस्थापक डॉ. राहुल घुले ने बुखार या कोविड-19 के लक्षणों की स्क्रीनिंग के लिए 50 पैरामेडिकल और प्रशिक्षित चिकित्सकों को फील्ड में तैनात किया है। 
उन्होंने कहा, 'हम जानते हैं कि बीएमसी (BMC) स्क्रीनिंग के लिए अपने कर्मचारियों को डोर-टू-डोर भेज पाने में सक्षम नहीं है, इसलिए हमने उनकी ओर से क्लीनिक शुरू करने और लोगों की स्क्रीनिंग करने का प्रस्ताव दिया है, लेकिन हमारा प्रस्ताव अभी भी आयुक्तों के पास अटका हुआ है। बीएमसी आयुक्तों प्रवीण परदेशी और अतिरिक्त आयुक्त सुरेश काकानी न तो फोन उठाते हैं और न ही मेसेज का जवाब देते हैं।

बीएमसी के लिए उनका प्रस्ताव था कि उनकी डॉक्टरों की टीम एक सप्ताह में, 5 प्रति व्यक्ति की दर से 10 लाख लोगों की जांच करेगी, लेकिन स्क्रीनिंग रणनीति पर शीर्ष स्तर पर असहमति थी।
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