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लॉकडाउन के बीच 3 राज्यों ने बदला लेबर लॉ, किसे फायदा किसे नुकसान?
May 9, 2020 • Rajkumar Gupta

नई दिल्ली
कोरोना वायरस के चलते लॉकडाउन के बीच बहुत सारी कंपनियों ने छंटनी शुरू कर दी है। ऐसे में तीन राज्यों की सरकारों ने लेबर लॉ में बदलाव किया है, ताकि लोगों को नौकरियां मिलें और साथ ही निवेश भी आकर्षित हो। सरकारें मान रही हैं कि इस कदम से थम सी गई अर्थव्यवस्था को एक बार फिर से रफ्तार मिलने में आसानी होगी। लेकिन ट्रेड यूनियन इसका विरोध कर रही हैं। अब सवाल ये है कि अगर सरकार का फैसला नौकरियां देने वाला है तो ट्रेड यूनियन इसका विरोध क्यों कर रही हैं? चलिए इसके फायदों और नुकसान के बारे में जानते हैं।
कौन से तीन राज्यों ने बदला लेबर लॉ

उनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात हैं, जिन्होंने लेबर लॉ में बदलाव किया है। सरकारें तो इसे अच्छा फैसला बता रही हैं, जो निवेश लाएगा, नौकरी देगा और अर्थव्यवस्था को रफ्तार देगा, लेकिन हर कोई इन तर्कों से सहमत नहीं दिख रहा।
ट्रेड यूनियनों का विरोध क्यों?

लेबर लॉ में बदलाव करने या यूं कहें कि इसके नियमों को आसान बनाने से ट्रेड यूनियन इसलिए परेशान हैं, क्योंकि ऐसी स्थिति में उन्हें लेबर का शोषण होने का शक है। अभी नियम काफी सख्त हैं, लेकिन फिर भी कई कंपनियों में मजदूरों का शोषण होता है, जिससे मजदूर परेशान हैं। ऐसे में ट्रेड यूनियन इसलिए भी विरोध कर रही हैं कि नियम आसान हो जाने से कंपनियां और फैक्ट्रियां पहले से भी अधिक शोषण करेंगी।
8 से बढ़ाकर 12 घंटे वर्किंग आवर

सबसे अहम बात ये जानना है कि आखिर सरकारों ने क्या बदलाव किया है। दरअसल, सरकारों ने काम करने के घंटों को प्रति दिन 4 घंटे बढ़ा दिया है। यानी जो पहले सप्ताह में 48 घंटे था, अब वह 72 घंटे हो जाएगा। वैसे तो सरकारों का तर्क है कि जो लेबर ओवरटाइम करना चाहेगा, वो करेगा, लेकिन ट्रेड यूनियनों को डर है कि ये सबसे लिए नियम हो जाएगा। सरकारों का कहना है कि इससे कंपनियों को वर्किंग आवर बदलने की इजाजत मिल जाएगी, जिससे निवेश आकर्षित होगा और रुका हुआ बिजनेस फिर से आगे बढ़ेगा। यानी कंपनियों के ज्यादा फायदा है, मजदूरों या कर्मचारियोंं को कम।
'नौकरी के बिना कैसे लेबर राइट्स'

केंद्रीय श्रम सचिव शंकर अग्रवाल ने कहा कि आज सबसे जरूरी है नई नौकरियां पैदा करना। इसका मतलब है कि कर्मचारियों को काम पर रखने के नियमों के साथ-साथ सैलरी और कर्मचारियों की सुरक्षा के नियमों में ढील देनी होगी। बिना नौकरी के लेबर राइट्स के बारे में बात करने का कोई मतलब नहीं। बता दें कि बचाव को लेकर बनाए नियमों में भी ढील दी गई है, जिसे मजदूरों की सुरक्षा के लिए बहुत ही जरूरी माना जाता है। ये भी वजह है कि ट्रेड यूनियन इसका विरोध कर रही हैं।
बाकी राज्य भी चल सकते हैं इसी रास्ते पर

बदलावों के बाद अब डर इस बात का सता रहा है कि बाकी राज्य भी इसी रास्ते पर चल सकते हैं। वह भी अपने यहां नियमों में ढील दे देंगे। हरियाणा ने इस ओर कदम बढ़ाना शुरू भी कर दिया है।