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लॉकडाउन में भीड़ लगाकर चलते लोगों ने बताया उन्हें कोरोना से डर क्यों नहीं लग रहा
March 29, 2020 • Rajkumar Gupta

नई दिल्ली
कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप की वजह से पूरा देश लॉकडाउन है। अब तक देश भर में करीब 1000 लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो चुके हैं और 25 लोगों की जान जा चुकी है। यह महामारी और न फैले, इसलिए पूरे देश में लॉकडाउन किया गया है। इस लॉकडाउन की वजह से पहले तो पूरे देश में कर्फ्यू जैसे हालात बने, लेकिन अब सड़कों पर हजारों की भीड़ चलती हुई दिख रही है। एक-दो लोगों को तो पुलिस मार-पीटकर भगा भी देती थी, लेकिन हजारों की भीड़ ने पुलिस समेत पूरी सरकार को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

कोरोना वायरस का संक्रमण तो एक दूसरे के पास खड़े होने से भी फैल सकता है और ऐसे में हजारों की भीड़ में ये मजदूर चिंता का सबब बन गए हैं। शनिवार शाम को तो दिल्ली के आनंद विहार में लोगों का ऐसा हुजूम उमड़ा था, जिसने सबको हैरान कर दिया। इससे पहले दिल्ली-गाजियाबाद बॉर्डर पर भी सैकड़ों लोगों की भीड़ पैदल ही अपने घरों को जाती दिखी। आखिरकार सरकार को भी इनके बारे में सोचना पड़ा और तमाम व्यवस्थाएं करनी पड़ीं। लेकिन सवाल यह है कि जब जानलेवा कोरोना वायरस फैल रहा है, तो ये लोग डर क्यों नहीं रहे और क्यों सड़कों पर निकल गए हैं? आइए उनकी आपबीती से समझते हैं इसकी वजह।

नैशनल हाइवे-9 पर क्या आदमी, क्या औरत और क्या बच्चे, सब पैदल चलते दिखे। ये लोग राजधानी दिल्ली से बरेली (281 किमी.), लखनऊ (500 किमी.), बहराइच (650 किमी.) और यहां तक कि बिहार के गांवों तक जा रहे हैं, जो दिल्ली से हजार किलोमीटर से भी अधिक दूर हैं। इसकी वजह है काम न होना, पैसा ना होना, पेट की भूख और रहने का ठिकाना न होना। 

छोटी बच्ची बोली- 'कमाएंगे नहीं तो खाएंगे क्या?'
दिल्ली से गोंडा यानी 600 किलोमीटर दूर जा रहे तीन परिवार 20 घंटों तक चलने के बाद हापुड़ के सिंभोली पहुंचे और वहां एक पेड़ के नीचे आराम करने के लिए रुके। उन्होंने बताया- 'हम रिक्शा चलाते हैं। हमारे साथ के सभी लोग अपने गांवों के लिए निकल गए हैं। हमारे पास न तो खाने के लिए खाना है, ना ही किराया देने के लिए पैसे, ऐसे में हमें घर छोड़ना ही पड़ा।' तीन रिक्शों में सामान लदा था और साथ में बच्चे और बाकी परिवार के लोग थे। इन लोगों में एक 7 साल की छोटी सी बच्ची भी थी, जो बोली- 'कमाएंगे नहीं तो खाएंगे क्या?' उसी के जैसे बहुत से बच्चे अपने मां-बाप के साथ सड़कों पर चलते दिखे।

पैदल चलने के अलावा पुलिस से बचना भी है संघर्ष
वहीं करीब 22-25 साल का एक कपल दिखा, जिसके लिए संघर्ष सिर्फ पैदल चलना नहीं, बल्कि पुलिस से बचते हुए निकलना भी था। वनवासी और गंगा, दोनों ही हरिद्वार से छत्तीसगढ़ के लिए 3 दिन पहले निकले थे। वे थोड़ा पैदल चल के और थोड़ा लिफ्ट मांगते-मांगते हापुड़ तक पहुंच गए थे। वनवासी ने बताया- 'मेरी नौकरी चली गई और ऐसा कोई नहीं था जो हमें खाने के लिए देता। जब मैं खाने की तलाश में बाहर निकला तो पुलिस ने मुझे बुरी तरह से पीटा।' उन्होंने ट्रकों और बसों से भी मदद मांगी, जो लखनऊ जा रहे थे, लेकिन पैसे नहीं मतलब कोई मदद नहीं।

यह उनकी किस्मत थी कि हापुड़ के विधायक विजय पाल उनके पास खाने के पैकेट लेकर पहुंच गए। पाल के बॉडीगार्ड्स ने एक बस को जबरन रुकवाया और कंडक्टर से कहा कि वह कपल को बैठा ले। उन्होंने 500 रुपए भी दिए। विजय पाल कहते हैं- पिछले तीन दिनों से इस हाइवे पर बहुत से लोग मानवता की मिसाल बनकर मदद करने में लगे हुए हैं। मैंने सरकार से ये गुहार भी लगाई है कि इन लोगों के लिए बस सेवा शुरू की जाए। 

किस्मत में मरना लिखा है तो अपनों में मरेंगे'
हाइवे पर सरकारी बसें चल रही हैं। बरेली जा रही ऐसी ही बस में चढ़ने के लिए एक मजदूर संजीव कुमार और अन्य 20 लोग दौड़े तो कंडक्टर ने कहा- '200 रुपए लगेंगे!' संजीव ने कहा- 'अगर हमारी किस्मत में मरना लिखा है तो हम अपने लोगों के बीच में मरेंगे।' करीब 20 लोगों के इस समूह में कुछ नाबालिग भी थे। वह पैदल चलते हुए और लिफ्ट मांग-मांगकर पंजाब से हापुड़ तक पहुंचे थे।

क्वारेंटाइन वह लग्जरी है, जो गरीबों के लिए नहीं है'
10 लोगों के एक ग्रुप शुक्रवार को शाम 7 बजे बहराइच जाने के लिए निकला था, जो सभी गुरुग्राम में जूस बेचने का काम करते हैं। उनमें से एक अशोक कुमार ने कहा- 'हम क्वारेंटाइन के बारे में जानते हैं, लेकिन क्वारेंटाइन वह लग्जरी है जो गरीब लोगों के लिए नहीं है। हम सभी एक साथ एक छोटे से किराए के कमरे में रहते हैं।' उसके दोस्त रामपाल यादव ने कहा कि 600 किलोमीटर पैदल चलना भी उन्हें डरा नहीं सकता है।

सरकार ने किए तमाम इंतजाम
सरकार ने पैदल अपने घरों को जाते हजारों लोगों को देखा तो उनके लिए तमाम इंतजाम भी किए हैं। करीब 1000 यूपी रोडवेज की बसें, 2000 तक प्राइवेट बसें, ट्रक, ट्रॉली, ट्रैक्टर सब कुछ लगा दिए गए हैं। दिल्ली सरकार ने भी हापुड़ तक के लिए 100 डीटीसी बसें लगाई हुई हैं। लेकिन इन सब से भी स्थिति सुधरती है या नहीं, ये देखना होगा।

मेडिकल सुविधाएं नहीं
जब हमने दिल्ली से अल्मोड़ा के बीच जब चेक किया तो उन्हें वहां पर एक भी मेडिकल फैसिलिटी नहीं दिखी। बसें लॉकडाउन का मजाक उड़ाती दिखीं, जिनमें अंदर तो अंदर, छतों तक पर खचाखच लोग भरे हुए थे।