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मजदूर दिवस: लॉकडाउन ने तोड़ दी कामगारों की कमर
May 1, 2020 • Rajkumar Gupta

मजदूर दिवस: लॉकडाउन ने तोड़ दी इन 10 कामगारों की कमरदुनियाभर में आज अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस  मनाया जा रहा है। यह दिन मजूदरों के हक, अधिकार और उनकी समानता की मांग के लिए याद किया जाता है। भारत में 1923 में मजदूर दिवस की शुरुआत हुई। हालांकि, देशभर के कामगारों और मजदूरों के लिए 2020 का मजूदर दिवस काफी निराशा भरा है। कोरोना (Corona) के कारण लॉकडाउन ) जारी है। इसी लॉकडाउन के कारण करोड़ों दिहाड़ी मजदूर, कामगार और बड़े-बड़े प्रफेशनल्स तक घर बैठ गए हैं। इंटरनेट के सहारे घऱ से काम करने वालों के अलावा बाकी कामगारों के लिए रोजी-रोटी कमा पाना भी मुश्किल है।
देशभर में करोड़ों कामगार प्रवासी के रूप में रहते हैं। अपने घर से दूर फंसे इन कामगारों के लिए तीन-चार लोगों के परिवार को पालना काफी मुश्किल हो रहा है। इस साल के मजदूर दिवस पर हर कामगार यही दुआ कर रहा होगा कि कभी भी ऐसा कोई और साल, दिन या महीना ना आए। दुनियाभर में जहां कहीं भी लॉकडाउन लागू है, वहां कामगारों के लिए रोजी-रोटी ही सबसे मुश्किल काम है।
आइए, भारत के मुख्य कामगारों, उनकी कमाई और और उनकी समस्या के बारे में समझने की कोशिश करते हैं। इन कामगारों का काम रुक जाने से देश की अर्थव्यव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है, जिसके परिणाम दूरगामी हो सकते हैं।
राजमिस्त्री

लॉकडाउन के दौरान हर प्रकार ने निर्माण कार्य पर रोक है। गांव से लेकर शहर तक राजमिस्त्री का काम करने वाले लाखों-करोड़ों लोग बेरोजगार बैठे हैं। शहरों में तो मिस्त्री का काम करने वालों के साथ उनका परिवार भी कंस्ट्रक्शन साइट पर ही रहता है। हजारों लोग ऐसी साइट्स पर ही फंसे हुए हैं। दूसरे चरण में सरकार ने कुछ निर्माण कार्यों को अनुमति दी है लेकिन इससे मामूली संख्या में मिस्त्रियों को राहत मिली है।
इलेक्ट्रिशियन

गर्मी के मौसम में सबसे ज्यादा जरूरत इन्हीं की होती है। गर्मी में बंद हुए पंखे-एसी और कूलर को फिर से चलाने के लिए इलेक्ट्रिशियन की ही जरूरत है। लॉकडाउन में इनका काम बंद होने से इनकी कमाई तो प्रभावित हुई ही है, आम लोग भी काफी परेशान हो रहे हैं। हालांकि, अब धीरे-धीरे इलेक्ट्रिशन और पंखे-कूलर वालों को शर्तों के साथ थोड़ी-बहुत छूट दी जा रही है।
प्लंबर

पीने के पानी से लेकर, बाथरूम और नाली तक में पाइप की फिटिंग और रिपेयरिंग करने वाले प्लबंर शहरों में लाखों की संख्या में होते हैं। मुंबई, दिल्ली और नोएडा जैसे महानगरों में अभी भी लाखों प्लंबर फंसे हैं। उनके पास ना तो कोई काम है ना और ही घर जाने का रास्ता। ऐसे में लॉकडाउन ने उनकी कमाई तो छीनी है, साथ ही साथ दो पल का सुकून भी छीन लिया है।
पेंटरT

महानगरों की लेबर चौक पर इकट्टा होने वाले राजमिस्त्री और मजदूरों के अलावा तीसरे बड़ी संख्या पेंटर की होती है। शहरों में बन रहे घरों को सुंदर बनाने और उनकी दीवारों की टिकाऊ बनाने वाले ये 'कलाकार' भी खाने-पीने को मोहताज हैं। जो शहरों में फंसे हैं, उनको किसी तरह खाना तो मिल जा रहा है लेकिन उनकी कमाई पर चलने वाला उनका परिवार काफी समस्या से गुजर रहा है।
मकैनिक

सड़क पर पंचर बनाने से लेकर बड़ी-बड़ी कार कंपनियों में काम करने वाले मकैनिक इन दिनों बेरोजगार हैं। मारुति और टाटा जैसी कंपनियां अप्रैल महीने में एक भी नई कार नहीं बेच पाई हैं। सड़क पर ना तो गाड़ियां चल रही हैं, ना वे खराब हो रही हैं। इस प्रकार छोटे-मोटे मिस्त्री-मकैनिक एक-एक पैसे को मोहताज हैं। उम्मीद है, जल्द ही सड़क पर गाड़ियां चलेंगी और ये फिर से कमाई कर सकेंगे।
फर्नीचर का काम करने वाले

लकड़ी और फर्नीचर के कारोबार से देश का एक बड़ा वर्ग जुड़ा हुआ है। शहरों ने नई बस रही कॉलोनियों और फ्लैट्स के लिए दरवाजे, खिड़की और अन्य जरूरी सामान बनाने के लिए करोड़ों बढ़ई लगे हुए हैं। लॉकडाउन में इनका काम ठप होने से ये भी बेरोजगार हो गए हैं। महानगरों में फंसे करोड़ों प्रवासी मजदूरों में लाखों की संख्या में बढ़ई और फर्नीचर का काम करने वाले लोग भी शामिल हैं।
रिक्शा, ऑटो और टेम्पो वाले

सार्वजनिक परिवहन के रूप में इस्तेमाल होने वाले रिक्शे, बैटरी रिक्शे, ऑटो और टेम्पो चलाने वालों की आमदनी पर ही देश का एक बड़ा वर्ग आश्रित है। लॉकडाउन के दौरान बाहर निकलने पर ही पाबंदी है तो रिक्शे और ऑटो में बैठेगा कौन। दिन में 200-300 से 1000-1200 भी कमा लेने वाले ये कामगार एकदम से बेरोजगार हैं। इसमें से कई तो ऐसे भी हैं, जिनकी गाड़ी ईएमआई पर है। उनके लिए भविष्य काफी अंधकारमय हो सकता है।

फूड वेंडर्स

देशभर में आज भी करोड़ों लोग हर दिन सड़क पर लगने वाली रेहड़ियों, ठेलों और फूड स्टॉल्स पर ही खाना खाते हैं। ब्रेड-मक्खन, बाटी चोखा से लेकर पराठा, बिरयानी और कई अन्य खाद्य सामग्रियां परोसने वाली यह फूड वेंडिंग इंडस्ट्री भी इस समय बंद है। ना खाने वाले लोग हैं, ना ही खिलाने वाले। हर दिन देशभर में करोड़ों-अरबों का कारोबार करने वाली इंडस्ट्री भी पूरी तरह से ठप है और करोड़ों फूड वेंडर्स बेरोजगार बैठे हैं। इनके पास सेविंग के नाम पर शायद ही कुछ हो, जिससे ये अपना घर चला सकें।
चायवाला

देश की हर गली के हर नुक्कड़ पर चाय की दुकान जरूर होती है। छोटी-मोटी चाय की दुकान रखने वाला शख्स भी 300-400 रुपये की कमाई कर लेता है। लॉकडाउन में सभी दुकानें बंद होने के कारण एक बड़े वर्ग की आजीविका पर तो संकट है ही, सरकारों को चीनी, चायपत्ती, दूध और अन्य संसाधनों से होने वाली कमाई में भी काफी कमी आई है।
सलूनकर्मी

सलून में बाल काटने, फेशियल करने या अन्य जरूरी कामों के लिए काम करने वाले कर्मचारी और ग्राहक काफी पास होते हैं। ऐसे में कोरोना फैलने का डर है। लॉकडाउन में सलून भी बंद कर दिए गए हैं। देश ही हर गली में सलून पाए जाते हैं, इस प्रकार लॉकडाउन के कारण करोड़ों लोग बेरोजगार बैठे हैं। लॉकडाउन खुलने के बाद भी सलूनकर्मियों को तुरंत राहत मिल जाएगी, इसके आसार बेहद कम हैं।